रविवार 8 नवंबर 2026 - 09:28
चेहरे बदलते हैं, नीतियाँ नहीं

चेहरे बदलते हैं, नीतियाँ नहीं

लेखक : मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी प्रबंधक, जामिया इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. सदर इमामबाड़ा, जौनपुर

हौज़ा / हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी ने कहा कि अमेरिकी सत्ता में राष्ट्रपति और नेतृत्व के चेहरे बदलते हैं, लेकिन उसकी नीतियों में बुनियादी बदलाव नहीं आता। डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन, दोनों सरकारों की विदेश नीति में अमेरिकी राष्ट्रीय और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी जाती है। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीन सहित मध्यपूर्व के विभिन्न देशों के हालात अमेरिकी नीतियों की वास्तविकता को उजागर करते हैं। अमेरिका के वादों और समझौतों पर आंख मूंदकर भरोसा करना उचित नहीं है। मजलूम कौमों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक जागरूकता, आत्मनिर्भरता और आपसी एकता को मजबूत करना होगा। वास्तविक न्याय किसी महाशक्ति की कृपा से नहीं, बल्कि जागरूकता और संगठित प्रयासों से स्थापित होगा।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी ने कहां,अमेरिकी व्यवस्था और उसके तहत सत्ता में आने वाले नेतृत्व हमेशा से दुनिया भर में चर्चा का विषय रहे हैं। जब भी अमेरिका में चुनाव के परिणामस्वरूप सत्ता परिवर्तन होता है और शासन की बागडोर किसी नए व्यक्ति के हाथों में आती है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह सवाल उठता है कि क्या नया नेतृत्व दुनिया की मज़लूम कौमों को न्याय दिला सकेगा? क्या वह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में न्याय और समानता का परिचय दे पाएगा? हालांकि, इतिहास, राजनीतिक परिस्थितियों और धार्मिक एवं वैचारिक नेताओं के बयानों पर नजर डालने से एक अलग तस्वीर सामने आती है।

अमेरिका और न्याय की स्थापना की वास्तविकता:

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों के विश्लेषण और ऐतिहासिक घटनाओं से यह बात सामने आती है कि अमेरिकी विदेश नीति केवल व्यक्तियों के बदलने से बुनियादी रूप से नहीं बदलती, बल्कि उस पर राष्ट्रीय हितों, प्रभावशाली लॉबियों और आर्थिक एवं रणनीतिक हितों का गहरा प्रभाव रहता है।

अमेरिका की नीतियाँ मुख्य रूप से उसके हितों पर आधारित होती हैं। चाहे डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में आए या रिपब्लिकन पार्टी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी कई प्रमुख प्राथमिकताएँ समान बनी रहती हैं। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया और फिलिस्तीन के हालात इसके उदाहरण के रूप में पेश किए जाते हैं, जहाँ अमेरिकी नीति की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इन मामलों में आलोचकों का कहना है कि न्याय और मानवाधिकारों की तुलना में अमेरिकी रणनीतिक हितों और इजराइल की सुरक्षा को अधिक प्राथमिकता दी गई।

मजलूम कौमों, विशेषकर मध्यपूर्व के लोगों के अधिकारों के मामले में अमेरिकी सरकारों की भूमिका भी आलोचना का विषय रही है। जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजराइल या अन्य शक्तिशाली देशों के खिलाफ कार्रवाई का सवाल उठा, अमेरिका ने कई मौकों पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपने वीटो अधिकार का इस्तेमाल किया। आलोचकों के अनुसार, इससे न्याय की स्थापना के प्रयास प्रभावित हुए।

धार्मिक एवं वैचारिक नेतृत्व का दृष्टिकोण:

आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद मुजतबा हुसैनी खामेनई (हिफ़्ज़हुल्लाह) और अन्य धार्मिक एवं वैचारिक नेताओं के बयानों के संदर्भ में अमेरिका की मध्यपूर्व नीति को ऐतिहासिक अनुभवों और जमीनी परिस्थितियों के आधार पर समझने की आवश्यकता है।

शहीद रहबर आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली खामेनई और क्षेत्र के अन्य धार्मिक एवं वैचारिक नेताओं ने बार-बार इस बात की ओर संकेत किया है कि अमेरिका में केवल चेहरे बदलते हैं, नीतियाँ नहीं। एक राष्ट्रपति या प्रशासन के जाने और दूसरे के आने से अमेरिकी विदेश नीति के बुनियादी स्वरूप में आवश्यक रूप से कोई परिवर्तन नहीं आता।

इसलिए आज आत्मनिर्भरता, राजनीतिक जागरूकता और आपसी एकता की अत्यंत आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्याय की स्थापना अमेरिकी शासकों की इच्छा पर निर्भर नहीं हो सकती, बल्कि इसके लिए उम्मते मुस्लिम और दुनिया की मजलूम कौमों को अपनी शक्ति, जागरूकता और एकता पर भरोसा करना होगा। लेखक के अनुसार, ईरान ने भी अपने संघर्ष और आत्मनिर्भरता के माध्यम से इसका उदाहरण प्रस्तुत किया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी नेताओं के बयानों और वादों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता। पूर्व में हुए समझौते इसका उदाहरण हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान परमाणु समझौते (जेसीपीओए) से अमेरिका को अलग कर लिया था। वर्तमान दौर में भी कूटनीतिक वार्ताओं और शांति प्रयासों को लेकर उठने वाले सवाल इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाते हैं। लेखक का मानना है कि अमेरिकी सरकारों के इस रवैये के कारण उनके वादों और समझौतों पर भरोसा करने से पहले उनके व्यावहारिक रिकॉर्ड का मूल्यांकन आवश्यक है।

चुनावी नतीजों और खुफिया गतिविधियों की भूमिका:

राजनीतिक चुनाव और सत्ता के केंद्रों में होने वाले फैसले केवल मतदान तक सीमित नहीं होते। इनके पीछे अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक, आर्थिक और खुफिया गतिविधियों की भूमिका पर भी चर्चा होती रही है। विशेष रूप से मोसाद और सीआईए जैसी एजेंसियों के प्रभाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक विश्लेषण सामने आते रहे हैं।

इजराइली लॉबी का प्रभाव:

अमेरिका में एआईपैक जैसी प्रभावशाली इजराइली लॉबी की भूमिका भी राजनीतिक बहस का विषय रही है। आलोचकों का कहना है कि इजराइल के समर्थन से जुड़े मुद्दों पर अमेरिकी नेताओं और उम्मीदवारों पर राजनीतिक एवं आर्थिक दबाव बनाया जाता है। जो उम्मीदवार इजराइल की नीतियों की आलोचना करते हैं या फिलिस्तीनियों के अधिकारों के समर्थन में आवाज उठाते हैं, उन्हें मीडिया और चुनावी वित्तपोषण से जुड़े दबावों का सामना करना पड़ सकता है।

साजिश या राजनीतिक रणनीति?

अमेरिकी चुनावों में किस उम्मीदवार को कितनी सफलता मिलती है, इसके पीछे मतदाताओं की पसंद के साथ-साथ आर्थिक संसाधनों, मीडिया, राजनीतिक संगठनों और प्रभावशाली लॉबियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह आरोप लगाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय प्रभावशाली नेटवर्क अमेरिकी घरेलू और विदेश नीति को इस प्रकार प्रभावित करते हैं कि उनके रणनीतिक हित सुरक्षित रहें। हालांकि, ऐसे आरोपों का मूल्यांकन ठोस प्रमाणों और स्वतंत्र तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

वास्तविक न्याय के लिए जागरूकता और एकता जरूरी

सच्चाई और ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर यह सवाल महत्वपूर्ण बना हुआ है कि क्या अमेरिकी सत्ता में आने वाले नेता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्याय की स्थापना और मजलूमों को उनका अधिकार दिलाने के लिए पर्याप्त कदम उठाते हैं? इतिहास में अमेरिकी नीतियों को लेकर अनेक विवाद और आलोचनाएँ सामने आई हैं।

जब तक विश्व की बड़ी शक्तियों की नीतियों में राष्ट्रीय हित, आर्थिक प्रभाव और रणनीतिक प्राथमिकताएँ प्रमुख रहेंगी, तब तक केवल अमेरिकी चुनावों में सत्ता परिवर्तन से किसी बड़े न्यायपूर्ण बदलाव की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं होगा।

वास्तविक न्याय की स्थापना के लिए आवश्यक है कि मजलूम कौमें जागरूक हों, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों को समझें और अपने अधिकारों के लिए संगठित एवं शांतिपूर्ण संघर्ष करें। उन्हें अपनी शक्ति, आत्मनिर्भरता और एकता पर भरोसा करना होगा।

अंत में, अल्लाह की बारगाह में दुआ है कि वह हम सभी को न्याय को समझने, सत्य का साथ देने और उसे अपने जीवन में अपनाने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।

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